यदि वादी अदालत में नहीं आता है तो क्या हो सकता है – अनुभवी वकील क्या कहते है

यदि वादी अदालत में नहीं आता है तो क्या हो सकता है अनुभवी वकील क्या कहते है – अदालत के नियम के अनुसार वादी को जरूरत पड़ने पर अदालत में बुलाया जाता हैं. लेकिन कई बार वादी अदालत में उपस्थित नही रहते हैं. ऐसे में कोर्ट उनके साथ क्या करती हैं. इस बारे में आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से बताने वाले हैं. तो इस महत्वपूर्ण जानकारी को पाने के लिए आज का हमारा यह आर्टिकल अंत तक जरुर पढ़े.

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दोस्तों आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से बताने वाले है की यदि वादी अदालत में नहीं आता है तो क्या हो सकता है. इसके अलावा इस टॉपिक से जुडी अन्य और भी जानकारी प्रदान करने वाले हैं.

तो आइये हम आपको इस बारे में संपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं.

यदि वादी अदालत में नहीं आता है तो क्या हो सकता है

कई बार अदालत में वादी को बुलाया जाता हैं. लेकिन किसी भी कारण से या बीना कारण के भी वादी अदालत में उपस्थित नही होते हैं. तो इस स्थिति में अदालत के आदेश 11 और नियम 12 के तहत वाद ख़ारिज कर दिया जाता हैं.

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कोर्ट में गवाही के बाद क्या होता है

कोर्ट में गवाही के बाद कुछ कार्य होते हैं. जो करने होते हैं. जिसके बारे में हमने नीचे जानकारी प्रदान की हैं.

  • कोर्ट में गवाही के बाद गवाही देने वाले व्यक्ति के एक नोटशीट पर दस्तखत लिए जाते हैं.
  • इसके बाद नोटशीट पर पुरे केस का वृतांत जज के द्वारा लिखा जाता हैं. इसके बाद उस नोटशीट पर जज भी अपने दस्तखत करते हैं.
  • गवाही देने के बाद यह नोटशीट एक रिकार्ड बन जाता हैं. और उसी के आधार पर जज फैसला सुनाते हैं.
  • अगर जज के सामने गवाही देने के बाद गवाही के साथ साथ सबूत भी ठोस हैं. तो जज के द्वारा फैसला सुनाया जाता हैं.

कोर्ट में झूठी गवाही की सजा

अगर कोई व्यक्ति कोर्ट में झूठी गवाही देता हैं. तो यह क़ानूनी अपराध माना जाता हैं. कोर्ट में झूठी गवाही देने के लिए अपराधी को तीन से सात साल की सजा सुनाई जाती हैं. साथ साथ जुर्माना भी भरवाया जाता हैं.

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न्यायालय में बारबार पेशियां क्यों होती है

किसी व्यक्ति पर अपराध लगने के बाद व्यक्ति को गिरफ्तार कर दिया जाता हैं. और उस पर कार्यवाही होती हैं. जब तक व्यक्ति का अपराध साबित नही हो जाता हैं. तब तक पुलिस की कार्यवाही चलती रहती हैं. इस दौरान न्यायालय के द्वारा व्यक्ति को कोर्ट में बुलाया जाता हैं. जिसे पेशी कहते हैं.

पेशी पर बुलाने का काम जज का होता हैं. जब तक व्यक्ति की कानूनी कार्यवाही चलती हैं. तब तक व्यक्ति को कोर्ट में पूछताछ के लिए पेशी पर बुलाया जाता हैं. लेकिन कई बार पेशी पर बुलाने पर व्यक्ति कोर्ट में हाजिर नही होते हैं.

ऐसे में जज के द्वारा पेशी के लिए अन्य तिथि दी जाती हैं. जब तक व्यक्ति कोर्ट में हाजिर नही होता. तब तक पेशियां होती रहती हैं. इस वजह से केस लंबा चलता हैं. और बार बार पेशियां होती रहती हैं.

गवाही के नियम

कोर्ट में गवाही के कुछ नियम हमने नीचे बताये हैं.

  • आप गवाही देने के लिए जिसे तैयार करते हैं. उसकी उम्र यानी की गवाह की उम्र 18 वर्ष से अधिक होनी चाहिए.
  • अगर कोई गवाह तैयार हुआ हैं. तो पुलिस पूछताछ में गवाह का मौजूद रहना जरूरी माना जाता हैं.
  • जब तक किसी व्यक्ति पर क़ानूनी कार्यवाही चलती हैं. तब तक गवाह को पुलिस के कहे अनुसार बर्ताव करना होता हैं. यानी की गवाह देश विदेश की यात्रा नही कर सकते हैं.
  • अगर गवाह को कही पर भी जाना जरूरी हैं. तो वह पुलिस से पूछकर उनकी परमिशन के बाद जा सकता हैं.
  • अगर गवाही देने वाला व्यक्ति झूठी गवाही दे रहा हैं. तो कोर्ट के द्वारा गवाही देने वाले व्यक्ति भी सजा और दंड दिया जाता हैं.

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मुकदमा खारिज होने पर क्या करें?

आपने काफी बार खारिज शब्द को सुना होगा. पुलिस इस शब्द का इस्तेमाल करती रहती हैं. यहाँ ख़ारिज का मतलब रिजेक्ट होता हैं. जब पुलिस के पास कोई शिकायत दर्ज होती हैं. तो ऐसे में पुलिस जांच पड़ताल करती हैं.

पुलिस के द्वारा जांच पड़ताल करने के बाद कोई पुख्ता सबूत नही मिलता हैं. या फाइनल रिपोर्ट में यह साबित होता है की रिपोर्ट झूठी हैं. तो इस मामले में आरोपी ने लगाई शिकायत ख़ारिज कर दी जाती है.

इस प्रकार की झूठी रिपोर्ट करने पर आरोपी को आईपीसी की धारा 182 के तहत सजा भी सुनावाई जाती हैं. लेकिन एक बार शिकायत खारिज हो जाने के बाद दुबारा पीड़ित व्यक्ति वरिष्टतम मजिस्ट्रेट के पास अपनी शिकायत दर्द करवा सकते हैं.

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

क्या कानूनी नोटिस का जवाब देना अनिवार्य है?

जब कोई आपके खिलाफ कोई कानूनी नोटिस भेजता हैं. तो ऐसे में आप क़ानूनी नोटिस भेजने वाले व्यक्ति के बातचीत कर सकते हैं. अगर बातचीत करने से मामल हल हो सकता हैं. तो ठीक हैं.

लेकिन अगर बातचीत करने से मामला हल नहीं होता हैं. तो ऐसे में आप भी क़ानूनी नोटिस का जवाब भेज सकते हैं. इसके लिए आप किसी वकील की सलाह ले सकते हैं.

क़ानूनी नोटिस का जवाब भेजने की समयसीमा कितनी है?

अगर आपके पास कोई क़ानूनी नोटिस आती हैं. तो ऐसे में जवाब भेजने के लिए आपके पास 30 से 60 दिनों का समय होता हैं. आपको इतने दिनों में क़ानूनी नोटिस का जवाब भेजना होता हैं.

अगर हम क़ानूनी नोटिस को नजर अंदाज करते है तो क्या होगा?

अगर आपके पास क़ानूनी नोटिस आती हैं. और आप उसे नजर अंदाज करते हैं. तथा समयसीमा के अंदर जवाब नही भेजते हैं. तो ऐसे में कोर्ट आपके पास दो बार क़ानूनी नोटिस भेजता हैं.

अगर आप दो बार क़ानूनी नोटिस को नजर अंदाज करते हैं. तो इस मामले को कोर्ट के द्वारा गंभीरता पूर्वक लिया जाता हैं. ऐसा करने पर आपके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही हो सकती हैं.

क़ानूनी नोटिस भेजने के बाद अगला कदम क्या हो सकता है?

अगर आप किसी व्यक्ति के खिलाफ क़ानूनी नोटिस भेजते हैं. और उक्त व्यक्ति क़ानूनी नोटिस का जवाब नही देता हैं. तो ऐसे में आप उस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकते हैं. या फिर कोर्ट में केस फाइल कर सकते हैं.

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निष्कर्ष

दोस्तों आज हमने आपको इस आर्टिकल के माध्यम से बताया है यदि वादी अदालत में नहीं आता है तो क्या हो सकता है . इसके अलावा इस टॉपिक से जुडी अन्य और भी जानकारी प्रदान की हैं.

हम उम्मीद करते है की आज का हमारा यह आर्टिकल आपके लिए उपयोगी साबित हुआ होगा. अगर उपयोगी साबित हुआ हैं. तो आगे जरुर शेयर करे. ताकि अन्य लोगो तक भी यह महत्वपूर्ण जानकारी पहुंच सके.

दोस्तों हम आशा करते है की आपको हमारा यह यदि वादी अदालत में नहीं आता है तो क्या हो सकता है अनुभवी वकील क्या कहते है आर्टिकल अच्छा लगा होगा. धन्यवाद

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